उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के ट्यूशन व्यवस्था की हकीकत बयां करती ‘हरामख़ोर’

लाइव सिटीज डेस्क: अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की फिल्म ‘हरामखोर’ लगभग तीन साल पहले ही बनकर तैयार थी और सेंसर के साथ साथ कुछ और मामलों की वजह से रिलीज हो पाने में देरी हो रही थी, वैसे फिल्म को कई सारे फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया जा चुका है और नवाजुद्दीन सिद्दीकी को न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड भी मिला है. फिल्म रिलीज होने को तैयार है. यह फिल्म मनोरंजन तो कम लेकिन एक बड़ा सन्देश देती है.

इस फ़िल्म के शुरू होने से पहले ही एक संदेश आता है कि फ़िल्म स्कूल जाने वाली उन बच्चियों और बच्चों के लिए बनी है जो अपने शिक्षकों या गार्जियन के द्वारा प्रताड़ित होते हैं. एक बेहद गंभीर और सच्चे विषय पर बनी इस फ़िल्म में माद्दा है कि यह आपको घृणा महसूस करवा सकती है और यही इस फ़िल्म की ताक़त है. निर्देशक श्लोक शर्मा ने इस फ़िल्म में एक ऐसा विषय उठाया है जो भारत और ख़ासकर उत्तर भारत में काफ़ी व्यापक है.

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श्याम (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) एक ट्यूशन टीचर हैं और अपनी नाबालिग़ छात्रा संध्या (श्वेता त्रिपाठी) के साथ नाजायज़ संबंध बनाते है और फिर उसका गर्भपात करवाने के लिए भी उसे लेकर जाते हैं.

गुरू शिष्या के बीच प्रेम कहानियां दिखाई गई हैं लेकिन उन कहानियों में प्रेम दो बालिग लोगों के बीच होता है और अक्सर वो काल्पनिक कहानियां होती हैं लेकिन ‘हरामखोर’ उत्तर भारत में मौजूद वीभत्स मानसिकता के सामान्य लोगों की कहानी है.

निर्देशक श्लोक शर्मा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में ट्यूशन पढ़ाने वाले टीचरों द्वारा घर की लड़की को भगा ले जाने या उससे शारीरिक संबंध बना लेने के कई केस पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं और ऐसे ही अनगिनत केसों पर यह कहानी आधारित है.

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छोटे इलाकों में मौजूद बच्चों के साथ क्या क्या समस्याएं आती हैं, कैसे उनकी मन में सेक्स, शादी, प्रेम आदि को लेकर ग़लत धारणाएं बन जाती हैं, यह फ़िल्म इसका अच्छा चित्रण करती है.

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